– नम्रता अगरवाल

 

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पेहेले हमारे घर में सुराही होती थी, एक्वागॉर्ड नहीं
मिट्टी के ढक्कन को हटाकर ग्लास भरा करते थे
बटन टीपकर तो अब ही पानी आता है

आज सब कुछ छूट गया है
ना मुझसे अब यह लोगों को चाहने की मुश्किल झेली जाती है
और ना ही उनके ना होने की रुसवाई

कल ही दूर चली जाउ तो भी क्या
पीछे मुड़कें देखते-देखते
सिर्फ़ बीता वक़्त दिखेगा

खोखले हर आवाज़ की तरह
वक़्त भी अब खोखला है

उस सुराही की पानी की ही प्यास लगती है अब
वही बस अटल थी
उस पानी की मेहेक
उस मिट्टी का किसी भी वक़्त टूट जाना

एक्वागॉर्ड का पानी प्यूरिफ़ाईड है
उस सुराही का तो साफ भी नहीं था

यादों में नहीं बह रही,
यही हूँ, अब तक

 


Written by Namrata Agarwal, Illustration by Sawani Chaudhary

Namrata Agarwal is pursuing a Master’s degree in Comparative Literature from Jadavpur University in Kolkata. She likes to translate poems from time to time. She also runs a blog : www.bythefallen.wordpress.com.

Sawani Chaudhary looks for art in places large and small. She can fangirl about travelling, Monet, Game of Thrones and cats in the same breath. She easily passes off as a Mumbaikar when in Mumbai but Pune runs in her blood.

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